विधानसभा में दो साल बनाम पाँच साल का घमासान

क्या मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के दो वर्ष के कार्य, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पाँच सालों पर भारी हैं?

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राजस्थान: राजस्थान की राजनीति एक बार फिर तीखे टकराव के दौर में है। विधानसभा के भीतर हाल ही में जो दृश्य देखने को मिला, उसने साफ कर दिया कि सत्ता और विपक्ष के बीच बहस अब केवल नीतियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह “दो साल बनाम पाँच साल” की सीधी तुलना में बदल चुकी है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकालों को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। सवाल यही है—क्या वाकई भजनलाल शर्मा के दो वर्षों के काम, गहलोत सरकार के पाँच सालों के कार्यों से ज़्यादा प्रभावी रहे हैं?


विधानसभा में क्यों बढ़ा सियासी तापमान?

राजस्थान विधानसभा में हालिया सत्र के दौरान विपक्ष ने सरकार से सवाल पूछे—महंगाई, बेरोज़गारी, कानून-व्यवस्था और किसानों के मुद्दों पर। जवाब में सत्तापक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस सरकार के पाँच सालों में जिन समस्याओं को जड़ जमा लेने दी गई, उन्हें भाजपा सरकार ने सिर्फ दो वर्षों में नियंत्रित करने की कोशिश की है।

इस दौरान तीखी बहस, शोर-शराबा और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप भी देखने को मिले। सदन के बाहर भी यही बहस जारी रही—“कौन बेहतर रहा?”


भजनलाल शर्मा सरकार: दो साल की प्राथमिकताएँ और दावे

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अपने अब तक के कार्यकाल में कुछ स्पष्ट प्राथमिकताएँ तय की हैं—

1. प्रशासनिक सख़्ती और निर्णय क्षमता

सरकार का दावा है कि निर्णय लेने की गति तेज़ हुई है। अफसरशाही पर नियंत्रण, फाइलों के लंबित रहने की समस्या और योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी को सरकार अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है।

2. कानून-व्यवस्था

भाजपा सरकार का कहना है कि संगठित अपराध, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के मामलों पर पहले की तुलना में अधिक कठोर कार्रवाई की गई। कई हाई-प्रोफाइल मामलों में एजेंसियों को खुली छूट देने का दावा भी किया गया।

3. आर्थिक अनुशासन

सरकार ने वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने और राजस्व संग्रह बढ़ाने की बात कही है। अनावश्यक सब्सिडी और खर्चों पर कटौती को “भविष्य की स्थिरता” से जोड़ा गया।

4. केंद्र सरकार से तालमेल

भजनलाल शर्मा सरकार की एक बड़ी ताकत केंद्र के साथ बेहतर समन्वय को माना जा रहा है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं का तेज़ी से क्रियान्वयन और अतिरिक्त फंड लाने को सरकार अपनी उपलब्धि बताती है।


अशोक गहलोत सरकार: पाँच साल का अनुभव और विरासत

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कार्यकाल लंबा रहा और उसमें कई बड़े फैसले लिए गए।

1. सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ

चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना, न्यूनतम आय गारंटी, और सामाजिक पेंशन जैसी योजनाओं ने गहलोत सरकार को “वेलफेयर स्टेट” की पहचान दी। इन योजनाओं का सीधा लाभ आम जनता को मिला।

2. स्वास्थ्य और शिक्षा

सरकारी अस्पतालों में मुफ्त जांच-इलाज, दवा वितरण और स्कूल-कॉलेजों के विस्तार को गहलोत सरकार की बड़ी उपलब्धि माना गया।

3. राजनीतिक अनुभव

गहलोत के पास प्रशासनिक अनुभव की कमी नहीं थी। संकट प्रबंधन, विपक्ष को साधना और राजनीतिक संतुलन बनाए रखना उनकी बड़ी ताकत रही।

4. आलोचनाएँ भी कम नहीं

हालांकि, पेपर लीक घोटाले, आंतरिक गुटबाज़ी और अंतिम वर्षों में प्रशासनिक ढिलाई को लेकर सरकार को भारी आलोचना झेलनी पड़ी।


दो साल बनाम पाँच साल: सीधी तुलना कितनी उचित?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल समय के आधार पर तुलना पूरी तस्वीर नहीं दिखाती।

  • दो साल में आमतौर पर सरकारें नीतिगत दिशा तय करती हैं

  • पाँच साल में योजनाओं का असर ज़मीनी स्तर पर दिखता है

भजनलाल शर्मा सरकार अभी “सुधार और सुधारात्मक कार्रवाई” के चरण में है, जबकि गहलोत सरकार का मूल्यांकन “परिणाम और प्रभाव” के आधार पर किया जाता है।


जनता क्या कहती है?

राजस्थान के शहरी इलाकों में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सख़्ती को लेकर सरकार को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक योजनाओं में बदलाव और कुछ लाभ बंद होने को लेकर नाराज़गी भी देखी जा रही है।

कई लोग मानते हैं कि—

  • गहलोत सरकार ने राहत दी

  • भजनलाल सरकार नियंत्रण और अनुशासन पर ज़ोर दे रही है


राजनीतिक संदेश और 2028 की तैयारी

यह बहस सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं है। यह आगामी चुनावों की पटकथा भी लिख रही है। भाजपा “कम समय में ज़्यादा काम” का नैरेटिव गढ़ना चाहती है, जबकि कांग्रेस “पाँच साल की स्थायी योजनाओं” को याद दिला रही है।


निष्कर्ष: भारी कौन पड़ा?

अगर सवाल यह हो कि क्या भजनलाल शर्मा के दो साल, अशोक गहलोत के पाँच सालों पर भारी हैं?
तो जवाब सीधा “हाँ” या “नहीं” में देना मुश्किल है।

  • नीति और प्रशासनिक सख़्ती के मामले में भजनलाल शर्मा सरकार आगे दिखती है

  • सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण के क्षेत्र में अशोक गहलोत सरकार की विरासत अभी भी प्रभावशाली है

अंततः फैसला जनता करेगी—विधानसभा में नहीं, बल्कि चुनावी मैदान में।