1.5 साल में MP फंड से एक रुपए का भी विकास कार्य नहीं कराया

MPLADS से Rajasthan के इन 3 सांसदों ने 9.80 करोड़ में से नहीं कराया 1 रुपये का भी काम !

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राजस्थान: राजस्थान की राजनीति में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। राज्य के तीन लोकसभा सांसदों ने अपने करीब डेढ़ साल के कार्यकाल में सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के तहत एक रुपए का भी विकास कार्य नहीं कराया है। यह खुलासा न केवल राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, बल्कि आम जनता के बीच भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

जानकारी के अनुसार, जोधपुर से सांसद और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, टोंक–सवाई माधोपुर से सांसद हरीश चंद्र मीणा और श्रीगंगानगर से सांसद कुलदीप इंदौरा ने अब तक अपने लोकसभा क्षेत्रों में सांसद निधि से कोई भी कार्य पूर्ण नहीं कराया है। जबकि नियमों के अनुसार, प्रत्येक सांसद को अपने क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए हर साल 5 करोड़ रुपए की सांसद निधि मिलती है। इस हिसाब से पांच साल के कार्यकाल में एक सांसद को कुल 25 करोड़ रुपए तक के विकास कार्य कराने का अधिकार होता है।

18वीं लोकसभा के गठन के बाद अब तक इन सांसदों को करीब 9 करोड़ 80 लाख रुपए की राशि सांसद निधि के तहत आवंटित की जा चुकी है। इसके बावजूद, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इन तीनों सांसदों द्वारा एक भी विकास कार्य पर खर्च नहीं किया गया। यानी MP फंड के तहत इनके संसदीय क्षेत्रों में जीरो काम और जीरो खर्च दर्ज किया गया है।

आंकड़ों के अनुसार, जोधपुर से सांसद और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने सांसद निधि से चार विकास कार्यों की अनुशंसा जरूर की है, लेकिन अब तक एक भी कार्य जमीन पर शुरू नहीं हो पाया है। वहीं श्रीगंगानगर से सांसद कुलदीप इंदौरा ने 27 कार्यों की अनुशंसा की, जिनमें से केवल तीन कार्य ही प्रारंभ हुए हैं, लेकिन इन पर भी अब तक कोई राशि खर्च नहीं हुई है। दूसरी ओर, टोंक–सवाई माधोपुर से सांसद हरीश चंद्र मीणा ने तो सांसद निधि से एक भी कार्य की अनुशंसा तक नहीं की, जिससे आने वाले समय में भी उनके क्षेत्र में MP फंड से विकास कार्य होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि सांसद निधि के उपयोग के लिए सांसद को किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। सांसद को अपने संसदीय क्षेत्र में स्कूल, सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, सामुदायिक भवन जैसे विकास कार्यों के लिए स्वतंत्र रूप से योजना बनाने और अनुशंसा करने का अधिकार प्राप्त होता है। इसके बावजूद यदि कोई सांसद अपने अधिकार क्षेत्र में विकास कार्य नहीं कराता है, तो यह उसकी कार्यशैली और प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है

स्थानीय स्तर पर लोगों का कहना है कि सांसद का मुख्य दायित्व सिर्फ संसद में भाषण देना नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास को गति देना भी है। ऐसे में जब करोड़ों रुपए की राशि उपलब्ध होने के बावजूद विकास कार्य नहीं हो रहे हैं, तो जनता के विश्वास को गहरा झटका लगता है।

यह मामला अब राजनीतिक बहस का रूप लेता जा रहा है। विपक्षी दल इसे जनप्रतिनिधियों की लापरवाही और जनता के अधिकारों की अनदेखी बता रहे हैं, जबकि समर्थक पक्ष इसे प्रशासनिक प्रक्रियाओं और फाइलों में देरी से जोड़कर देख रहा है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सांसद निधि का पूरा अधिकार सांसद के पास है, तो फिर इन संसदीय क्षेत्रों में विकास कार्य क्यों नहीं हो रहे? क्या यह राजनीतिक उदासीनता है या जनता के मुद्दों से दूरी? आने वाले समय में जनता और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया इस मुद्दे को और बड़ा बना सकती है।