
राजस्थान के नगर निकाय चुनावों के बाद अब अलग-अलग राजनीतिक नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों के परिणाम भी चर्चा में हैं। शहरी निकायों में अध्यक्ष पद के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कई जगह बोर्ड बनाने में सफलता हासिल की है, जबकि कांग्रेस ने भी अपने प्रभाव वाले कुछ क्षेत्रों में जीत दर्ज कराई। उपलब्ध परिणामों के मुताबिक 301 शहरी स्थानीय निकायों के परिणाम घोषित होने तक भाजपा ने 197 निकायों में बोर्ड बनाया, जबकि कांग्रेस के 94 निकायों में बोर्ड बने। निर्दलीयों ने भी सात निकायों में अध्यक्ष पद हासिल किया।
इन चुनावों में प्रदेश के बड़े नेताओं के प्रभाव वाले इलाकों की तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं रही। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ से जुड़े क्षेत्रों में भाजपा को सफलता मिली, वहीं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के प्रभाव वाले इलाकों में कांग्रेस ने भी अपनी स्थिति मजबूत दिखाई। इस वजह से निकाय चुनाव के परिणामों को स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नगर निकायों के अध्यक्ष पद के चुनाव में भाजपा ने बड़ी संख्या में बोर्ड अपने पक्ष में किए। 301 घोषित निकायों में भाजपा के 197 और कांग्रेस के 94 बोर्ड बनने की जानकारी आकाशवाणी ने दी है। इसके अलावा सात निकायों में निर्दलीय अध्यक्ष चुने गए, जबकि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, आम आदमी पार्टी और CPI(M) के उम्मीदवारों ने भी एक-एक निकाय में अध्यक्ष पद हासिल किया।
इससे साफ है कि अध्यक्ष पद के चुनाव में केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच ही मुकाबला नहीं रहा। कई जगह निर्दलीय पार्षदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। कुछ निकायों में बहुमत का आंकड़ा किसी एक दल के पास नहीं होने के कारण अध्यक्ष पद के चुनाव में स्थानीय समीकरण और पार्षदों का समर्थन निर्णायक बना।
निकाय चुनाव में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में पार्टी को कई जगह सफलता मिली। वहीं कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के क्षेत्रों में भी पार्टी ने कुछ निकायों में अपना आधार बनाए रखा।
इस चुनाव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली से जुड़े क्षेत्रों के परिणामों पर भी राजनीतिक नजर रही। कांग्रेस ने इन क्षेत्रों में कुछ महत्वपूर्ण निकायों में जीत हासिल की। इससे यह तस्वीर सामने आती है कि स्थानीय निकाय चुनावों में राज्य स्तरीय राजनीतिक प्रभाव के साथ-साथ स्थानीय संगठन, प्रत्याशी और क्षेत्रीय समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सचिन पायलट के प्रभाव वाले टोंक क्षेत्र का परिणाम भी चुनाव के बाद चर्चा में रहा। टोंक नगर परिषद के सभापति पद के चुनाव में मयंक गोयल के जीतने की रिपोर्ट सामने आई है। इसके अलावा जिले की विभिन्न नगर पालिकाओं में भी अध्यक्ष पद के परिणाम घोषित हुए।
टोंक को लंबे समय से सचिन पायलट की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में यहां के निकाय परिणामों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं होना स्वाभाविक है। हालांकि स्थानीय निकाय चुनाव के परिणामों को किसी एक नेता के व्यक्तिगत प्रभाव का सीधा पैमाना मानने के बजाय स्थानीय उम्मीदवारों और वार्ड स्तर के समीकरणों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
राज्य के बड़े शहरी निकायों में भी भाजपा ने कई जगह सफलता हासिल की। पांच नगर निगमों के परिणाम घोषित होने पर भाजपा ने चार में बोर्ड बनाया, जबकि बीकानेर में कांग्रेस को सफलता मिली। अलवर, उदयपुर, अजमेर और पाली में भाजपा के महापौर चुने गए, जबकि भरतपुर और भीलवाड़ा में भाजपा उम्मीदवार पहले ही निर्विरोध महापौर चुने जा चुके थे। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम के महापौर पद के चुनाव 25 सितंबर को होने हैं।
इस तरह नगर निगम स्तर पर भी भाजपा को कई महत्वपूर्ण शहरों में बढ़त मिली है। हालांकि जयपुर, जोधपुर और कोटा के महापौर चुनाव अभी बाकी होने के कारण इन तीन बड़े शहरों की तस्वीर 25 सितंबर के बाद पूरी तरह स्पष्ट होगी।
निकाय चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन भी पूरी तरह कमजोर नहीं रहा। 94 शहरी स्थानीय निकायों में कांग्रेस के बोर्ड बनने की जानकारी सामने आई है। कई स्थानों पर पार्टी ने अपने पार्षदों के समर्थन से अध्यक्ष पद हासिल किया।
जैसलमेर जिले के परिणाम भी मिश्रित रहे। जैसलमेर नगर परिषद में भाजपा के विजय डांगरा सभापति चुने गए, जबकि पोकरण नगरपालिका में कांग्रेस की कल्पना रंगा अध्यक्ष बनीं। पोकरण में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बताई गई।
भीलवाड़ा में भी भाजपा ने जिले की 10 नगर पालिकाओं में से सात में अध्यक्ष पद हासिल किया, जबकि कांग्रेस को तीन नगर पालिकाओं में सफलता मिली।
निकाय चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन भी रहा। वार्ड चुनावों के अंतिम आंकड़ों में भाजपा ने 4,179 वार्ड, कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते थे। कई निकायों में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बढ़ गई।
यही कारण है कि कुछ जगह वार्ड चुनाव में अधिक पार्षद जीतने वाली पार्टी भी अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं जीत सकी। धौलपुर नगर परिषद में कांग्रेस के पास 27 पार्षद होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार गिरीश कुमार गर्ग अध्यक्ष चुने गए। इस तरह के परिणाम बताते हैं कि अध्यक्ष पद का चुनाव और वार्ड स्तर के परिणाम अलग-अलग राजनीतिक समीकरण पैदा कर सकते हैं।
निकाय चुनाव के परिणामों के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हुई है। भाजपा ने परिणामों को जनता के समर्थन के रूप में पेश किया है। वहीं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। डोटासरा ने सरकारी मशीनरी और पुलिस प्रशासन के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। ये कांग्रेस के आरोप हैं, जिन पर भाजपा की ओर से अलग राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई है।
ऐसे आरोपों को चुनाव परिणामों के तथ्य से अलग देखना जरूरी है। परिणामों के स्तर पर भाजपा ने बड़ी संख्या में बोर्ड बनाए हैं, जबकि कांग्रेस और निर्दलीयों ने भी कई निकायों में प्रभाव कायम रखा है।
नगर निकाय चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनावों से अलग होते हैं। यहां स्थानीय सड़क, सफाई, पानी, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट, यातायात, अतिक्रमण और वार्ड स्तर की समस्याएं मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, स्थानीय संगठन और पार्षदों के बीच समीकरण भी अध्यक्ष पद के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसी वजह से किसी नेता के क्षेत्र में पार्टी की जीत या हार को केवल राज्य स्तरीय राजनीति के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं होगा। अलग-अलग निकायों में परिणामों के पीछे स्थानीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण रही हैं।
अब प्रदेश की नजर जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम के महापौर चुनाव पर है। इन तीनों नगर निगमों के महापौर पद के चुनाव 25 सितंबर को प्रस्तावित हैं और इसी दिन परिणाम भी घोषित किए जाएंगे।
कुल मिलाकर राजस्थान के निकाय चुनावों में भाजपा ने अध्यक्ष पद के चुनाव में बड़ी संख्या में बोर्ड बनाए हैं, लेकिन बड़े नेताओं के प्रभाव वाले सभी क्षेत्रों में परिणाम एक जैसे नहीं रहे। भाजपा और कांग्रेस दोनों को अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता मिली है, जबकि निर्दलीयों ने कई जगह समीकरण प्रभावित किए हैं। इसलिए इन परिणामों की तस्वीर को स्थानीय स्तर के राजनीतिक समीकरणों, उम्मीदवारों और निकायवार नतीजों के साथ देखना अधिक उपयुक्त होगा।