
केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि BRICS सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास के प्रमुख इंजन हैं। हालांकि, बड़े पैमाने पर निजी पूंजी जुटाने के मामले में इन देशों के सामने कई समान संरचनात्मक चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए निवेशकों का भरोसा बढ़ाने, जोखिम कम करने और लंबे समय के लिए स्थिर एवं विश्वसनीय वित्तीय ढांचा तैयार करने की जरूरत है।
वित्त मंत्री बुधवार को जयपुर में BRICS वित्त मंत्रियों एवं केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठक के दौरान “द रोल ऑफ द न्यू डेवलपमेंट बैंक इन मोबिलाइजिंग प्राइवेट कैपिटल इन मेंबर कंट्रीज” विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित कर रही थीं। यह सेमिनार निजी पूंजी को विकास परियोजनाओं तक पहुंचाने और बहुपक्षीय विकास बैंकों की भूमिका पर केंद्रित था।
कार्यक्रम में न्यू डेवलपमेंट बैंक की अध्यक्ष डिल्मा रूसेफ ने भी विशेष संबोधन दिया। आर्थिक कार्य विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर और FICCI के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विजय शंकर सहित कई वरिष्ठ नीति निर्माता, वित्तीय संस्थानों और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
निर्मला सीतारमण ने अपने संबोधन में बहुपक्षीय विकास बैंकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे संस्थान निवेश से जुड़े जोखिम को कम करने, परियोजनाओं को बैंकिंग के लिहाज से अधिक आकर्षक बनाने और निवेशकों का विश्वास मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।
वित्त मंत्री के अनुसार, विकास परियोजनाओं के लिए बड़े स्तर पर निजी पूंजी जुटाने के लिए केवल बाजार में पैसा उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। निवेशकों को यह भरोसा भी होना चाहिए कि परियोजना से जुड़े नियम, नीतियां और संस्थागत व्यवस्थाएं लंबे समय तक स्थिर रहेंगी।
उन्होंने कहा कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे की जरूरत बहुत बड़ी है। सरकारों के पास सीमित संसाधन होने के कारण निजी क्षेत्र की पूंजी और विशेषज्ञता को विकास प्रक्रिया से जोड़ना जरूरी है। ऐसे में बहुपक्षीय विकास बैंक सरकार और निजी निवेशकों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का काम कर सकते हैं।
वित्त मंत्री ने भारत के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने लगातार सार्वजनिक पूंजीगत व्यय और संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से देश के इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम को मजबूत किया है।
उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक की तुलना में सार्वजनिक निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका उद्देश्य देश में ऐसी उत्पादक राष्ट्रीय परिसंपत्तियां तैयार करना है, जो आने वाले वर्षों में आर्थिक गतिविधियों को गति दे सकें।
सरकार ने राजमार्ग, रेलवे, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स सिस्टम, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा नेटवर्क जैसे क्षेत्रों में निवेश पर जोर दिया है। वित्त मंत्री ने कहा कि मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर न केवल आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है, बल्कि निजी क्षेत्र के लिए निवेश के नए अवसर भी पैदा करता है।
निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि सरकार की नीति सार्वजनिक पूंजी को निजी निवेश का विकल्प बनाने की नहीं है। इसके बजाय सार्वजनिक निवेश को निजी निवेश के लिए उत्प्रेरक के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
इस उद्देश्य से केंद्र सरकार ने कई वित्तीय और संस्थागत सुधार किए हैं। इनमें वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF), हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM), क्रेडिट एन्हांसमेंट मैकेनिज्म, इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs), नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन और PM गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान जैसी पहल शामिल हैं।
वायबिलिटी गैप फंडिंग का उद्देश्य ऐसी परियोजनाओं को सहायता देना है, जो आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल व्यावसायिक आधार पर निजी निवेशकों के लिए पर्याप्त आकर्षक नहीं हो सकतीं।
ऐसी परियोजनाओं में सरकार की वित्तीय सहायता निजी क्षेत्र के लिए जोखिम और लागत को कम करने में मदद कर सकती है। इससे सार्वजनिक हित वाली परियोजनाओं में निजी पूंजी की भागीदारी बढ़ाने का रास्ता खुलता है।
सड़क बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल का उल्लेख करते हुए वित्त मंत्री ने बताया कि इसका उद्देश्य जोखिम को अधिक संतुलित तरीके से साझा करना है।
सरकार और निजी क्षेत्र के बीच जोखिम का उचित बंटवारा परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहार्यता को बेहतर बना सकता है। इससे निजी निवेशकों के लिए लंबी अवधि की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भागीदारी का भरोसा बढ़ सकता है।
वित्त मंत्री ने इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट यानी InvITs को भी महत्वपूर्ण माध्यम बताया। इनके जरिए इंफ्रास्ट्रक्चर परिसंपत्तियों में लगी पूंजी को दोबारा उपयोग में लाने और लंबी अवधि के संस्थागत निवेशकों को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है।
इसी तरह नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (NIP) निवेशकों को लंबी अवधि के लिए परियोजनाओं और निवेश अवसरों की बेहतर जानकारी उपलब्ध कराने का माध्यम है।
सरकार की कोशिश है कि इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेशकों को केवल वर्तमान परियोजनाओं की जानकारी न मिले, बल्कि उन्हें आने वाले वर्षों के निवेश अवसरों का भी स्पष्ट अंदाजा हो। इससे निजी क्षेत्र की दीर्घकालिक योजना बनाने की क्षमता मजबूत हो सकती है।
निर्मला सीतारमण ने PM गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान का भी उल्लेख किया। इसका उद्देश्य विभिन्न परिवहन माध्यमों के बीच बेहतर समन्वय और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी विकसित करना है।
बेहतर कनेक्टिविटी से लॉजिस्टिक्स की दक्षता बढ़ाने, परिवहन लागत कम करने और परियोजनाओं के बीच तालमेल बेहतर करने में मदद मिल सकती है। इसका सीधा असर व्यापार और निजी निवेश के माहौल पर भी पड़ सकता है।
वित्त मंत्री के अनुसार, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास केवल सड़क या रेलवे निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरे आर्थिक नेटवर्क को एक-दूसरे से जोड़ने की दिशा में होना चाहिए।
वित्त मंत्री ने केंद्रीय बजट 2026-27 में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देने के लिए किए गए विभिन्न उपायों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि इनमें नए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, नए राष्ट्रीय जलमार्गों को परिचालन में लाना और तटीय कार्गो प्रोत्साहन योजना जैसे उपाय शामिल हैं।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य परिवहन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को मजबूत करना तथा आर्थिक गतिविधियों को अधिक कुशल बनाना है। बेहतर माल परिवहन व्यवस्था से उद्योगों के लिए बाजार तक पहुंच आसान हो सकती है और निवेश के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
वित्त मंत्री ने कहा कि BRICS अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक विकास के प्रमुख इंजन हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर निजी पूंजी जुटाने के मामले में इन देशों के सामने कई समान चुनौतियां हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनौती केवल पूंजी की उपलब्धता की नहीं है। असली चुनौती ऐसा माहौल तैयार करना है जिसमें निजी निवेशक लंबे समय तक पूंजी लगाने के लिए भरोसा महसूस करें।
इसके लिए भरोसा, स्थिरता, पूर्वानुमेयता और विश्वसनीय दीर्घकालिक ढांचा जरूरी है। यदि निवेशकों को नीतिगत अनिश्चितता या परियोजना से जुड़े जोखिम अधिक दिखाई देते हैं, तो बड़े स्तर पर निजी पूंजी जुटाना कठिन हो सकता है।
वित्त मंत्री ने कहा कि BRICS देशों को ऐसे संस्थागत और वित्तीय ढांचे विकसित करने पर ध्यान देना होगा, जो निजी क्षेत्र की निरंतर भागीदारी को प्रोत्साहित कर सकें।
निर्मला सीतारमण ने अपने संबोधन में कहा कि विकासात्मक वित्त का भविष्य साझेदारी में निहित है। उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय संस्थानों, राष्ट्रीय सरकारों और निजी क्षेत्र की अपनी-अपनी विशिष्ट क्षमताएं हैं।
सरकारें नीति और सार्वजनिक निवेश उपलब्ध करा सकती हैं, बहुपक्षीय संस्थाएं जोखिम कम करने और वित्तीय संरचना तैयार करने में मदद कर सकती हैं, जबकि निजी क्षेत्र पूंजी, तकनीक और परियोजना प्रबंधन की विशेषज्ञता लेकर आ सकता है।
इन तीनों के बीच बेहतर तालमेल से बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं को वित्त उपलब्ध कराया जा सकता है। यही मॉडल BRICS देशों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
आर्थिक कार्य विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर ने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि विकासात्मक वित्त ऐसे चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां बड़े स्तर पर काम करने के साथ-साथ मजबूती और लचीलापन भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पूंजी जुटाने की प्रक्रिया केवल अनुकूल आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं हो सकती। इसके लिए ऐसे ढांचे विकसित करने होंगे जो लंबे समय तक टिकाऊ रहें।
अनुराधा ठाकुर के अनुसार, ऐसे संस्थागत ढांचे को मजबूत करने में बहुपक्षीय सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को लंबे समय तक वित्तीय स्थिरता और निवेश क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
जयपुर में आयोजित सेमिनार में वरिष्ठ नीति निर्माता, बहुपक्षीय संस्थानों और निजी क्षेत्र के प्रमुख प्रतिनिधियों ने भाग लिया। मुख्य संबोधन के बाद निजी पूंजी और विकासात्मक वित्त से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत पैनल चर्चा भी हुई।
पैनल चर्चा में IRDAI के चेयरमैन अजय सेठ, न्यू डेवलपमेंट बैंक के वाइस-प्रेसिडेंट रोमन सेरोव, Sertrading के एलेसांद्रो टेक्सीरा, Tencent के वरिष्ठ सलाहकार योंगपिंग झाई और Tata Capital Decarbonisation Fund के पंकज सिंडवानी सहित BRICS देशों, वित्तीय संस्थानों, थिंक टैंक और अकादमिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
जयपुर में हुई चर्चा का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि BRICS देशों की विकास जरूरतों को पूरा करने के लिए सार्वजनिक निवेश के साथ-साथ निजी पूंजी की भी बड़ी भूमिका होगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी, परिवहन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की जरूरत है। इन क्षेत्रों में सरकारी संसाधनों के साथ निजी क्षेत्र की पूंजी को जोड़ना विकास की गति बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
लेकिन निजी निवेश केवल वित्तीय प्रोत्साहनों से नहीं आता। निवेशकों को स्थिर नीतियां, स्पष्ट नियम, जोखिम प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था और दीर्घकालिक भरोसा चाहिए। वित्त मंत्री ने इसी व्यापक दृष्टिकोण पर जोर दिया।
जयपुर में आयोजित यह सेमिनार BRICS देशों के बीच विकासात्मक वित्त और निजी पूंजी जुटाने को लेकर सहयोग बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। चर्चा में भारत ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और सार्वजनिक निवेश के अनुभव को साझा किया।
निर्मला सीतारमण का संदेश स्पष्ट रहा कि भविष्य के विकास के लिए सरकार, बहुपक्षीय विकास संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है। सार्वजनिक पूंजी को निजी निवेश के लिए आधार और उत्प्रेरक बनाकर बड़े स्तर की परियोजनाओं को वित्त उपलब्ध कराया जा सकता है।
BRICS देशों के लिए आने वाले समय में चुनौती यह होगी कि वे ऐसे वित्तीय और संस्थागत ढांचे तैयार करें, जो निजी निवेशकों को लंबे समय तक भरोसा दे सकें। यदि पूंजी, नीति और संस्थागत क्षमता के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाता है, तो विकासात्मक वित्त को नई गति मिल सकती है और BRICS अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक आर्थिक वृद्धि में अपनी भूमिका को और मजबूत कर सकती हैं।