
जयपुर: राजस्थान की राजनीति में सांसद लोक निर्माण निधि (MPLADS) को लेकर एक नया विवाद सामने आया है, जिसने राज्य के राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। प्रदेश के गृह राज्यमंत्री जवाहर सिंह बेढम ने कांग्रेस सांसद संजना जाटव पर आरोप लगाया है कि उन्होंने राजस्थान के हिस्से की सांसद निधि को हरियाणा के कैथल क्षेत्र में खर्च करने की अनुशंसा की, जिससे राजस्थान के विकास हितों को नुकसान पहुँचा है। यह मामला तब सामने आया है जब राजस्थान के कई क्षेत्रों में बुनियादी विकास कार्य अभी भी अधूरे हैं और राज्य के विकास की प्राथमिकताएँ अब भी पूरी तरह से नहीं पूरी हुई हैं।
जवाहर सिंह बेढम ने मीडिया से बातचीत में बताया कि संजना जाटव सहित तीन कांग्रेस सांसदों ने कुल 1.20 करोड़ रुपये से अधिक की सांसद निधि राजस्थान के बजाय हरियाणा के कैथल में खर्च करवाई। उन्होंने इसे नियमों और संसदीय निधि की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए कहा कि जब राजस्थान में सड़कें, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और अन्य बुनियादी ढांचे के कार्य अधूरे पड़े हैं, तब बाहर अन्य राज्य में धन का इस्तेमाल करना उचित नहीं है। मंत्री बेढम ने इसे राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से उठाया गया कदम बताया और कहा कि इससे राजस्थान की जनता के साथ अन्याय हुआ है। उन्होंने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से इस पूरे मामले की जांच कराने की भी मांग की।
वहीं, इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस सांसद संजना जाटव ने आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि सांसद निधि के नियमों के अनुसार, सांसद किसी भी राज्य में विकास कार्यों के लिए राशि की अनुशंसा कर सकते हैं। संजना जाटव ने यह भी दावा किया कि भाजपा के कई सांसदों ने पहले भी अन्य राज्यों में MPLADS फंड का उपयोग किया है। उनका कहना है कि उनके द्वारा हरियाणा में निधि का उपयोग केवल विकास कार्यों को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया था और इसमें कोई अनियमितता नहीं है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में और अधिक तूल पकड़ सकता है, खासकर तब जब राजस्थान में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव होने वाले हैं। उनका कहना है कि सांसद निधि को लेकर यह विवाद दोनों मुख्य दलों—कांग्रेस और भाजपा—के बीच राजनीतिक हमले और पलटवार का नया माध्यम बन सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार, MPLADS फंड का उद्देश्य विशेष रूप से सांसद के क्षेत्र के विकास के लिए होता है, लेकिन इसका उपयोग राज्य की सीमा पार कर देना नियमों की जटिलताओं और राजनीतिक बहस को जन्म देता है। विपक्ष इस मामले का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर सकता है, वहीं कांग्रेस इसे नियमों के भीतर किए गए कार्य के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
राजस्थान में यह विवाद कई सवाल खड़े करता है। क्या सांसद निधि का उद्देश्य केवल अपने राज्य तक सीमित है या अन्य राज्यों में भी विकास कार्य के लिए इसका प्रयोग वैध है? क्या यह राजनीतिक लाभ के लिए किया गया कदम था या वास्तव में विकास परियोजनाओं के कारण ऐसा किया गया? इन सवालों का जवाब आने वाले समय में जांच और राजनीतिक बहस के दौरान ही स्पष्ट होगा।
इस बीच, जनता और राजनीतिक विश्लेषक दोनों ही इस मुद्दे पर नजर बनाए हुए हैं। राजस्थान के कई हिस्सों में बुनियादी ढांचे की स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे में जब राज्य के अंदर ही कई कार्य अधूरे हैं, बाहर अन्य राज्यों में निधि का प्रयोग करना क्या सही है, यह सवाल राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गया है।
इस प्रकार, राजस्थान की राजनीति में सांसद निधि विवाद ने नए सिरे से बहस को जन्म दिया है और आने वाले चुनावी दौर में इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने की संभावना है। यह विवाद केवल निधि के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के विकास, राजनीतिक जवाबदेही और सांसदों के कर्तव्यों पर भी प्रकाश डालता है।